Skip to main content

Posts

भारत का सामाजिक धार्मिक संतुलन

    भारत का समाज संस्कृतियों का समुच्चय है।मानव सभ्यता के विकास के साथ ही भारत ने संस्कृतियों को सहेजना शुरू कर दिया था।अतिप्राचीन और अतिनवीन संस्कृतियों को आज भी संजों ...
Recent posts

विचारों का हिंसक प्रतिरोध -

      सबसे पहले विचार पैदा होता है,विचार परिवर्तन लाता है और विचार ही दिशा देता है ।वैचारिक भिन्नता प्रकृतिगत है।इस वैचारिक भिन्नता के कारण ही दुनिया इतनी विविधतापूर्ण ...

कितने मुक्त हुए हम जातिवाद से ।

      कितने मुक्त हुए हम जातिवाद से? जाति की उत्पत्ति निर्विवाद नहीं है,लेकिन जातिवाद से होने वाला नुकसान निर्विवाद है। पुरातन काल में जातियां एक कौम की तरह व्यवहार करती थी।पहले पहल यह भले ही रूढ़ि न रहा हो लेकिन बाद में 95 प्रतिशत जनता जातिय गुलामी की ओर चली गयी ।जातिय गुलामी मतलब, इनको पढने लिखने का अधिकार नहीं था ,ये धन का संचय नहीं कर सकते थे ,इनके साथ अमानवीय व्यवहार भी उचित माना जाता था।सबसे बड़ी बात कि इनको भूमि का स्वामी नहीं माना जाता था ।जब चाहे भूमि से बेदखल कर दिया जाता था ।  इसका परिणाम यह हुआ कि,चाहे शासन विदेशी राजा का हो या फिर देशी राजा का ,इनके अमानवीय दशा में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला था । 5 प्रतिशत जनता देश की रक्षा नहीं कर पायी और 95 प्रतिशत जनता रक्षा करने के लायक नहीं थी क्योंकि इनको हथियार उठाने का अधिकार ही नहीं था। यही कारण है कि भारत सदियों तक गुलाम रहा । अब छुआछूत जैसी कुप्रथा समाप्त हो गयी है लेकिन जातिवाद आज भी हावी है ,बुद्धिमान लोग इसे बढ़ाने में लगे हुए हैं । जातिवाद का असर अब धीरे धीरे सामाजिक जीवन में कम हो रहा है लेकिन राज...

भारत और मैं

मैं भारत भूमि को भारत का निवासी होने के नाते इसे शत्-शत् नमन करता हूँ। भारत देश मेरी अन्तरात्मा की तरह है। मैं इसे आत्मसात कर युगों युगों तक इसमें विलिन हो जाना चाहता हूँ।      जहाँ तक मैंने भारत को समझा और विचार किया कि इस देश को भारत माता क्यों कहा जाता है शायद दुनिया में यही एक अनोखा देश है जिसने विश्व में पैदा होने वाली अनेक संस्कृतियों को अपने आँचल में संजों के रखा है और इस देश में विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों ने बराबर का सम्मान पाया है। ठीक उसी तरह जैसे एक माँ अपने सभी बच्चों को बराबर का प्यार दुलार देती है। विश्व की क्रूरतम संस्कृतियों ने इस देश में स्थान पाया और देश के हरियाली आँचल में पलकर उनकी क्रूरता पर प्रेम का आवरण चढ़ा और उनकी संस्कृति ने महानता को ग्रहण किया।                ऐसे महान भारत भूमि को मेरा शत् शत् नमन् । राजेश वर्मा निचलौल।