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विचारों का हिंसक प्रतिरोध -

      सबसे पहले विचार पैदा होता है,विचार परिवर्तन लाता है और विचार ही दिशा देता है ।वैचारिक भिन्नता प्रकृतिगत है।इस वैचारिक भिन्नता के कारण ही दुनिया इतनी विविधतापूर्ण है ।

      विचार हमेशा सैद्धान्तिक होते हैं इसको व्यवहार द्वारा साबित करना पड़ता है ।वैचारिक समानता और वैचारिक असमानता उतना ही स्वभाविक है जितना रात और दिन।जब दो लोग एक ही विचार पर सहमत होते हैं तो एक साथ मिलकर काम करते हैं और जब विचार अलग-अलग होते हैं तो वे अपने कर्मो से अपने विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करते हैं और वैचारिक भिन्नता नये नये रास्तों को जन्म देती है ।

    परन्तु इसका दूसरा स्याह पहलू भी है जब वैचारिक भिन्नता हिंसक संघर्ष का रूप ले लेती है।

     प्रारम्भ में मनुष्य पशुओं के लिए,भूमि के लिए ,चरागाहों के लिए ,स्त्री के लिए हिंसक संघर्ष करता आया है ।परन्तु कृषि अर्थव्यवस्था के प्रारम्भ होने के बाद संसाधनों की प्रचुरता हो गयी ।अब लड़ाई वैचारिक हो गयी ।

     यह एक मनोवैज्ञानिक रहस्य है,मनुष्य अपने को ईसाई मुस्लिम बौद्ध या हिन्दू कहलाना क्यों पसंद करता है?मनुष्य अपने को ईसाई हिन्दू बौद्ध या मुस्लिम के रूप में क्यों संगठित करता है?ऐसा मनुष्य उसके मन में बैठे हुए एक अज्ञात भय के कारण करता है।

        मनुष्य के हित एक दूसरे से टकराते हैं,मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन मनुष्य ही है ।इसी अज्ञात भय को दूर करने के लिए मनुष्य विभिन्न वैचारिक धार्मिक समूहों में अपने आप को संगठित करता है ।

        सभी धार्मिक समूह मनुष्य को सभ्य बनाने का दावा भले ही करते हो लेकिन वह मानव को मानवीय मूल्यों से दूर ले जाते हैं ।

       सापेक्षिकता का सिद्धान्त यह कहता है कि कोई चीज काली इसलिए है कि कोई चीज सफ़ेद है,रात है तभी दिन से हम उसका सम्बन्ध स्थापित कर पाते है।ईसाई खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करते है इसलिए कि दूसरे धर्म का अस्तित्व है ।मुस्लिम इसलिये सर्वश्रेष्ठ साबित करते है कि ईसाई धर्म का अस्तित्व है ।जब दुनिया में एक ही धर्म होता तो हम उसकी तुलना नहीं कर पाते तो छोटे बड़े या अच्छे बुरे का कोई विचार भी नहीं होता ।

         तो ! इन सापेक्षिक विचारों में निरपेक्ष क्या है--मानवीय मूल्य।
   मनुष्य अपने अनुभवों से अच्छे बुरे का भेद स्थापित कर सकता है यह उसके विचारने की शक्ति है ।

       मानवीय प्रेम शाश्वत और चिरंतन है ।पशु प्रेम में केवल वासना उसे निकट लाती है ।लेकिन वासना रहित प्रेम मनुष्य के वश की बात है।

       विश्व में विचारों के हिंसक टकराव का सबसे बड़ा कारण यही है कि हम मानवीय मूल्यों से परे हटकर सोचते हैं।धार्मिक मूल्य कभी मानवीय मूल्य का स्थान नहीं ले सकता है ।

         आज जरुरत है हमें फिर से मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का जिससे विश्व में शांति की स्थापना हो सके और मनुष्य को उसके मनुष्य होने का गौरव हासिल हो सके ।

    राजेश वर्मा
    निचलौल,महाराजगंज

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